बुधवार, 3 जुलाई 2013

जार घरे पुकुर नय...

<< उमेश कुमार >>

सन 1912 के प्रदेश विभाजन तक देवघर समेत सारा संताल परगना पश्चिम बंगाल के अंतर्गत था. सहज ही देवघर के परिवेश पर बांग्ला संस्कृति से प्रभावित दिखता है. सन् 1975 तक देवघर के करौं, मधुपुर, रिखिया, जसीडीह, नीलकंठपुर, बोम्पास टाउन जैसे शस्य श्यामला क्षेत्रों के पुराने वाशिदें के घरों में एक लोकोक्ति बहुत प्रचलित थी- ह्यजहां घरे पुकुर ना तार घोरे बिटी दिबो ना !ह्ण यानी जिसके घर पोखर नहीं है, उसके घर बेटी नहीं ब्याहूंगा. इस लोकोक्ति से साबित होता है कि पोखरे पुरानी ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक संपन्नता के प्रतीक थे. इस कारण, पुराने जमींदार, रजवाड़े और सद्गृहस्थ बड़े उत्साह के साथ पोखर बनवाया करते थे. ये पोखर जहां नित्य के स्नान-ध्यान के बड़े केंद्र थे, वहीं मत्स्य-पालन , कमल, सार्खी फूल आदि उत्पादन द्वारा सीमांत आय के
साधन भी.
देवघर शहरी क्षेत्र में संपन्न लोगों ने इसी तर्ज पर बड़ी संख्या में पोखर खुदवाये थे. ये पोखर ह्यवाटर हार्वेस्टिंगह्ण में महान स्रोत थे. लेकिन, 80 के दशक में देवघर में जमीन के कारोबार ने बड़ी ऊंची रफ्तार पकड़ ली. जमीन के बदले मिलनेवाली कीमत ने निजी पोखरों के साथ-साथ सरकारी पोखरों के अस्तित्व पर भी ग्रहण लगा दिया. पर्यावरणविद् घनश्याम भाई ने सन 2004-06 में संताल परगना के तालाबों की परंपरा पर एक शोध अध्ययन करवाया था. ह्यदेवघर के लुप्तप्राय पोखरे : ठहरे हुए पानी का दर्दह्ण शीर्षक से संपन्न इस शोध अध्ययन के दौरान इस शोधकर्ता ने ज्ञान के किसी उदात्त शिखर का स्पर्श नहीं किया, बल्कि इतना भर जाना कि पोखरे बेकार के गड्ढे नहीं हैं! इनके पीछे हमारी देशज तकनीक, परंपरा, प्रकृति सम्मत जीवन की संस्कृति और आस्था का संबल है. आइये, देवघरके कुछ पोखरों की अवस्थित और जमीन पर उनके बने रहने के संघर्ष का अवलोकन करें -

शिवगंगा
लगभग 5000 की स्थानीय आबादी रोजाना यहां नहाती-धोती है और साल में 5000 मूत्तियां यहां विसर्जित होती है. ऊपर से जल भराई और निकासी का कोई खास इंतजाम नहीं. अनुमान सहज है कि शिवगंगा की क्या गत हुई होगी. शिवगंगा के जल के बारे में इतिहासकार डॉ राजेंद्रलाल मित्रा ने भी ब्रिटिशकाल में अपनी कुछ चिंता जाहिर की है. डॉ मित्रा ने लिखा है कि 900 गुणा 600 फीट क्षेत्रफलवाले शिवगंगा में जलस्तर 13 फीट था. पानी का रंग हरा था और शुद्ध नहीं था. आलम तब था जब छत्तीसी-बत्तीसी का पानी शिवगंगा में निर्बाध रूप से आता था.
मानसरोवर
देवघर में जिस पुरातात्विक महत्व के जलागार की सर्वाधित दुर्गति हुई है, वह नि:संदेह मानसरोवर अथवा मानसिंघी है. आज यहां शायद ही कोई नहाता है. सिर्फ धोबी लोग उत्तरी तट पर कपड़े धोने के लिए इस पोखरे को उपेक्षित छोड़ दिया है. यह आलम तब है जब इसके साथ बादशाह अकबर के सिपहसलार राजा मानसिंह का नाम जुड़ा है. अपनी ओडि़शा-यात्रा की सफलता के लिए मांगी गयी मन्नत के पूरा होने के उपलक्ष्य में मानसिंह ने सन् 1585 ई में इसे खुदवाया और इसके जल से बाबा वैद्यनाथ का अभिषेक किया. आज भी मानसिंह के समय चुनारगढ़ के बलुआही पत्थर से बने पुराने घाट यहां मौजूद हैं. घाटों की लंबाई 16 से 20 फुट तक है. यहां प्रयुक्त पत्थर कहीं-कहीं 5 गुणा 4 फीट के हैं.
जलसार
वास्तव में मानसरोवर के दक्षिण बना पोखर जल का संग्रह यानी सार ही है. कहते हैं कि राजा मानसिंह के काफिले के हाथी-घोड़ों की पानी संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए इस पोखरे का निर्माण किया गया था. बाद में यहां मत्स्य विभाग के तालाब भी बने. इधर जलसार का उत्तरी भाग थोड़ा विस्तारित करवा दिया गया है.
लेकिन, साल 2011 में मत्स्य विभाग के दो तालाबों को साबूत भर कर यहां सोलर प्लांट लगा दिया है. पर्यावरणविदों का मानना है कि तालाबों की कीमत पर विकास आत्मघाती हो सकता है.
हरदलाकुंड
मान्यता है कि सती का हृदय यहीं गिरा है. पर, धार्मिक पृष्ठभूमि के बावजूद 2007 तक यह पोखर एक सहज कूड़ेदान में तबदील हो गया था. लेकिन, जागरूक बंगभाषी समाज ने तत्कालीन स्थानीय विधायक का ध्यान आकृष्ट कराया और इसका जीर्णोद्धार हो गया. आसपास के जो कुएं सूख गये थे, उनमें फिर से पानी आ गया.
छत्तीसी
रामपुर मौजा का यह पोखर पूरब से लेकर पश्चिम तक जल-प्रवाह का पुराना स्रोत है. यह अब संकटग्रस्त हो चुका है.
बत्तीसी
यह पोखर अब भी जीवंत है. यहां पहले लोहे का गेट काम करता था. वर्षा में जब जलस्तर बढ़ जाता था तो गेट खोलकर अतिरिक्त पानी निकाल दिया जाता था. यह पानी छोटी जोरिया के रास्ते शिवगंगा में चला आता था. जोरिया में लोग नहाते-धोते थे. अब यह नाले में बदल चुका है.
संकटग्रस्त पोखर
जूनबांध, दूबे पोखर, साहेब पोखर, ढिबी पोखर, दाता पोखर, हालीमा बांध, सिमरगढ़ा पोखर, कोढि़या तालाब, सुंदरबांध, मानसरोवर के सटे पोखर, मोतिया तालाब, पांडे पोखर, रामपुर पोखर, नंदन पहाड़ पोखर, नर्मदा बांध, हरिशरणम कुटीर पोखर आदि.

गहराती प्यास बेबस झारखंड

<< राहुल सिंह >>

ये उदाहरण झारखंड में जल संरक्षण की गौरवशाली परंपरा, बेहतर जल प्रबंधन की बदौलत सुखी गांव की कहानी बताने के साथ ही भविष्य के खतरों को लेकर भी आगाह करते हैं. अपने राज्य के आधे लोगों को शुद्ध पेयजल नहीं मिलता, जबकि हमारे तीन-चौथाई खेतों की प्यास नहीं बुझती.  इस दिशा में ध्यान नहीं दिये जाने के कारण यह स्थिति बनी.  झारखंड में जल संरक्षण की पर्याप्त संभावना होने के बावजूद यहां उसके लिए बेहतर काम नहीं हो सका है. राज्य में शहरों के साथ गांव की भी स्थिति खतरनाक होती जा रही है. औसतन 1200 से 1400 मिली बारिश प्रतिवर्ष होने के बावजूद यहां जलसंकट बना रहता है. जिस साल अच्छी बारिश नहीं हुई, उस साल सूख पड़ना लगभग तय. बीते साल अच्छी बारिश ने पहली बार बेहतर फसल से किसानों की झोली भरी. बहरहाल, राज्य में पेयजल व सिंचाई दोनों ही स्तरों पर पानी की जबरदस्त किल्लत है.
राज्य के 52 प्रतिशत गांव में पेयजल की बेहतर व्यवस्था नहीं है, जबकि कुल कृषि भूमि के मात्र 24.5 प्रतिशत (हालिया सरकारी दावों के मुताबिक 38 फीसदी) हिस्से के लिए ही सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं. जबकि देश के कुछ विकसित राज्यों में 70 से 80 प्रतिशत कृषि भूमि के लिए सिंचाई का साधन उपलब्ध है. राज्य में यह हाल तब है, जब  70 प्रतिशत किसान सिंचाई के लिए भू-जल पर ही निर्भर हैं. यह खतरनाक स्थिति है. पानी संचय के वैकल्पिक स्रोत विकसित नहीं किये जाने के कारण गंभीर जल संकट झेलना राज्य की मजबूरी बन गयी है. हालांकि बीते साल राज्य में पानी के संचय को लेकर दो अच्छी पहल हुई है. एक तो सरकार ने पहली बार एक स्पष्ट जल नीति बना कर पानी के दोहन, उसके संचय व सूखे से निबटने के लिए गाइड लाइन तय की. दूसरी पंचायत निकायों की भागीदारी पानी के प्रबंधन से संबंधित मामलों में स्पष्ट रूप से तय की गयी.
सिंचाई के मोर्चे पर अब तक फेल
दरअसल पानी को लेकर राज्य की की स्थिति ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया वाली कहावत को चरितार्थ करता है. पूर्वी भारत का वन आच्छादित एक ऐसा राज्य  जहां अच्छी बारिश होती है, वैसे राज्य में जल संकट शोचनीय मुद्दा है. राज्य सरकार द्वारा पिछले वर्ष बनायी गयी जल नीति में कहा गया है कि राज्य के 38 लाख हैक्टेयर फसली भूमि में 80 प्रतिशत भूमि सूखा व सात प्रतिशत भूमि बाढ़ झेलने को मजबूर है. सरकारी दावे के अनुसार मार्च 2012 तक राज्य की कुल फसली भूमि में 9.23 लाख हैक्टेयर भूमि में सिंचाई साधन उपलब्ध हो गया. राज्य सरकार ने 2017 तक 67 प्रतिशत कृषि भूमि को सिंचाई साधन उपलब्ध कराने की बात कही है. यानी झारखंड पांच वर्ष बाद राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंचेगा.  राज्य की 70 प्रतिशत कृषि भूमि सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर है. जबकि देश के विकसित राज्यों में 70 से 80 भूमि के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है.
सरकार ने पिछले वर्ष बनायी गयी अपनी जल नीति में जल उपभोक्ता समिति गठित कर उसके माध्यम से ही सिंचाई जल का प्रबंधन कराने की बात कही है. इसमें पंचायत निकायों को भागीदार बनाने की बात कही गयी है. लघु सिंचाई में इनकी भागीदारी कारगर साबित होगी. इस तरह की समिति प्रशासनिक आदेश या सरकार के द्वारा बनाये गये कानून के आधार पर काम करेगी. इसके ऊपर केनाल व जल संचय के अन्य माध्यमों के प्रबंधन की जिम्मेवारी होगी. साथ ही इस प्रोजेक्ट के माध्यम से स्वीकृत अन्य योजनाओं की भी जिम्मेवारी होगी. हालांकि आने वाले सालों में ही सरकार की जल नीति का फायदा समझ में आ सकेगा. अगर यहां सिंचाई की बेहतर व्यवस्था हो जाये, तो कृषि उत्पाद में दोगुणी वृद्धि हो सकती है.
पेयजल की भी स्थिति चिंताजनक
राज्य में बीते सालों में साफ व शुद्ध पेयजल की मांग बढ़ी है. 1991-2001  व 2001-2011 के बीच राज्य की आबादी क्रमश:  24.55 प्रतिशत व 22.3 प्रतिशत बढ़ी. लेकिन इस अनुपात में यहां पेयजल की उपलब्धता नहीं बढ़ी.
इस संबंध में आंकड़े चौकाने वाले हैं. देश के विभिन्न विकसित राज्यों में ग्रामीण पाइप पेयजल आपूर्ति योजना मजबूत हो चुकी है. गुजरात में 50, 000, कर्नाटक में 61, 000, महाराष्ट्र में 27, 000 व तमिलनाडु में 64, 000 ग्रामीण पाइप पेयजल आपूर्ति योजना काम कर रही है, जबकि झारखंड में मात्र 350 पाइप पेयजल आपूर्ति योजना काम कर रही है, उनमें भी सबों की स्थिति व रख-रखाव अच्छी नहीं है. चालू वित्तीय वर्ष में सरकार ने 1000 से अधिक आबादी वाले 1197 गांवों में छोटी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के क्रियान्वयन का लक्ष्य रखा है.
सरकार की कोशिश है कि पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित कराने में शहर व गांव दोनों स्तरों पर लोगों की अधिक से अधिक  भागीदारी सुनिश्चित करायी जाये. सामुदायिकता के आधार पर व स्थानीय निकायों के माध्यम से पेयजल साधनों की मरम्मत, रख-रखाव व संचालन किया जाये. वर्तमान में 93 प्रतिशत आबादी को नलकूपों से सात प्रतिशत आबादी को ग्रामीण पाइप जलापूर्ति योजना से पानी की आपूर्ति की जा रही है.

आमुख कथा

1-- 1901-03 में गठित सिंचाई आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि छोटानागपुर व संताल परगना क्षेत्र में सिंचाई के लिए आहर व बांध की बेहतर व्यवस्था थी. सिंचाई के 85 प्रतिशत काम इन्हीं आहरों व बांधों से हुआ करता था. पानी धीरे-धीरे रिसता था और जब आहर का पानी पूरा सूख जाता था, तब किसान उसमें गेहूं व चने की फसल बोते थे. इससे रबी की अच्छी फसल हो जाती थी.

2-- राज्य के प्रमुख शहर जमशेदपुर, बोकारो व धनबाद में एक साल में जलस्तर दो फीट नीचे चला गया, जबकि रांची का तीन फीट. गोड्डा जैसा छोटा शहर भी गर्मियों में गंभीर जल संकट झेलता है. वहां तीन साल में भूजल का दोहन तीन गुणा बढ़ गया.

3-- रांची जिले के अनगड़ा प्रखंड की टांटी पंचायत के सिंगारी गांव की पूरी जीवन व्यवस्था तालाब पर निर्भर है. लगभग दो हजार की आबादी वाले इस गांव में 18 तालाब हैं. इन तालाबों के कारण गांव का जलस्तर बना रहता है और किसान अच्छी उपज हासिल करते हैं. इसी तरह रांची के ही बेड़ो प्रखंड  की खुखरा पंचायत के 16 तालाब व पिठोरिया के पांच तालाब वहां की जीवन व्यवस्था के आधार हैं. गिरिडीह के बुधियाडीह व उसके आसपास के चार गांव के लोग पानी की बेहतर व्यवस्था के लिए तालाब की मरम्मत करने के अभियान शुरू कर चुके हैं.

चर्चा में

बाबूगीरी से बेबस एमबीए सरपंच

पंचायती राज व्यवस्था की पोस्टर गर्ल के रूप में मशहूर देश की पहली एमबीए महिला सरपंच(पंचायत प्रधान) छवि राजावत इन दिनों सरकारी बाबुओं की दखलअंदाजी से परेशान है. उनका कहना है कि आज भी पंचायती राज व्यवस्था ब्लॉक के बाबुओं की मोहताज है और जब तक इनका दबदबा खत्म नहीं होती पंचायतें स्वतंत्र और आत्मनिर्भर साबित नहीं हो पायेंगी.
देश के बड़े संस्थान से एमबीए की डिग्री लेने के बाद एक बड़े कॉरपोरेट की नौकरी छोड़कर छवि राजावत ने राजस्थान के सोडा पंचायत के सरपंच(वहां मुखिया के पद को सरपंच कहा जाता है) पद के लिए चुनाव लड़ा. जीत के बाद उन्होंने जिस इमानदारी से अपनी पंचायत के लिए काम करना शुरू किया उससे जल्द ही देश भर में उनकी ख्याति हो गयी. उन्हंे संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जहां उन्होंने भारतीय पंचायत व्यवस्था के मसले पर लोगों को संबोधित किया.
मगर इन दिनों छवि अपने ब्लॉक और सब डिविजन के अधिकारियों से जूझ रही हैं. उनका कहना है कि वे कई बार बेवजह काम में अड़ंगा डालते हैं और पंचयात प्रतिनिधियों को बार-बार उनके दफ्तर का चक्कर लगाना पड़ता है. वे बताती हैं कि मनरेगा के तहत उनके पंचायत को 3 करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये हैं मगर अब तक इसका 25 फीसदी फंड ही जारी हुआ है. वे अपने पंचायत में मनरेगा का कंप्यूटरीकृत दफ्तर बनाना चाहती हैं, मगर एसडीओ इसमें रोड़े अटका रहे हैं.
वहीं गांव के एक बाहुबली व्यक्ति ने पंचायत की जलापूर्ति को बाधित करने के उद्देश्य से बीच रास्ते मंे तालाब खुदवा दिया है. मगर इसे रोकने में प्रशासन उनकी कोई मदद नहीं कर रहा. वे आगे बताती हैं कि सरकार एक सरपंच को सिर्फ 3 हजार रुपये प्रतिमाह का मानदेय देती है. मगर उसे जितनी बार कामकाज के सिलसिले में शहर जाना पड़ता है, यह पैसा उसी में खर्च हो जाता है. ऐसे में एक सामान्य आय वर्ग का इमानदार सरपंच अपना परिवार कैसे चला सकता है?

जल संरक्षण के लिए पीएम का आह्वान
परंपरा, कानून और कीमतों पर जोर

पहली बार देश में जल सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है. मंगलवार, 10 अप्रैल को इस समारोह के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री के व्याख्यान के प्रमुख अंश-
जल से संबंधित विषयों से निपटने के लिए जो हमारे देश में मौजूदा संस्थागत एवं कानूनी ढांचे हैं वह अपर्याप्त हैं तथा उसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है.  इसके लिए एक सुझाव है कि जल पर सामान्य सिद्धांतों की एक वृहत राष्ट्रीय कानूनी रूपरेखा तैयार की जाए, जो सभी राज्यों में जल शासन पर आवश्यक विधान तैयार करने में मददगार हो सके. राष्ट्रीय जल मिशन ने जल उपयोग क्षमता में 20 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य रखा है.  इसकी दशा सबसे अधिक कृषि क्षेत्र में दयनीय है, जो कि हमारे सभी जल संसाधनों का तीन-चौथाई हिस्सा इस्तेमाल करता है और जहां जल उपयोग क्षमता अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों की तुलना में कम है. सिंचाई प्रणाली के लिए संकीर्ण अभियांत्रिकी-निर्माण केन्द्रित दृष्टिकोण से निकल कर हमें अधिक बहुपक्षीय एवं भागीदारी वाला दृष्टिकोण अपनाना होगा. जलापूर्ति के लिए प्राथमिक हितधारकों द्वारा कीमतों के निर्धारण में हमें अधिक पारदर्शी एवं सहभागी तंत्र की जरूरत है. हमारी कुल जरूरत के दो-तिहाई से अधिक निर्भरता भू-जल पर ही है. देश के सभी भागों में घटता जल स्तर एक गंभीर चिंता का विषय है. वर्तमान कानून प्रत्येक भू-मालिक को बोरवेल के द्वारा असीमति जल-दोहन का अधिकार देता है. बिजली एवं जल के लिए अपर्याप्त एवं कम कीमतों से भी इनके दुरुपयोग को बढ़ावा मिलता है. हमें ऐसी स्थिति का निर्माण करना है जहां भू-जल संसाधन को सार्वजनिक संपत्ति के रूप में स्वीकार किया जा सके. हमें जलीय स्तरों की भागीदारी प्रबंधन को प्रोत्साहित करने की भी आवश्यकता है, ताकि जल के दोहन के तौर-तरीकों को बढ़ावा दिया जा सके और उनका टिकाऊ तथा समान उपयोग सुनिश्चित किया जा सके. यह वास्तविक रूप में उपलब्ध भू-जल से जुड़ा है. हमें भू-जल के दुर्लभ स्रोतों के उपयोग योग संबंधी स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करने के प्रस्ताव पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए. हमारे पूर्वजों ने पानी को एकत्र करने के शानदार आधार तैयार किये, जो तकनीकी रूप से विविध और इंजीनियरी के सुदृढ़ सिद्धांतों पर निर्मित थे. ये स्थानीय परिस्थितियों के लिए तैयार किये गए थे और प्रत्येक जल व्यवस्था को स्थानीय भागीदारी और सामुदायिक नियंत्रण के जरिए प्रबंध किए जाते थे. हमें इस चातुर्य को अपनाने की आवश्यकता है, जो हमारे बीच विद्यमान थी और हमें मिलकर समाधान निकालने में सहयोग करना चाहिए, जिससे पानी के पुनर्चक्र ीकरण, पुर्न उपयोग और रीचार्ज में सहायता मिलेगी.

अपनी बात

झारखंड की धरती में दबा पानी का खजाना अब खाली होने को है. एक से दो साल के अंदर ही चापाकलों से पानी के बदले बालू निकलने लगता है. ड्रिप बोरिंग फेल हो रहे हैं. यह स्थिति तब है, जब इस साल गरमी देर से आयी है और पिछले साल जमकर बारिश हुई थी. राज्य में पानी का संकट कितना गहरा है, इसका अंदाजा धरती विज्ञानियों की रिपोर्ट से लगता है. राज्य के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से में भू जल का स्तर खतरे के लाल निशान को पार कर गया है. धड़ाधड़ लग रहे चापानलों के बावजूद गांव प्यासे हैं. चुइयां भी सूख रही हैं. अगर, इस बार मानसून ने धोखा दिया, तो खेती का संकट और गहरा हो जायेगा. झारखंड में पानी के अंधाधुंध दोहन ने न केवल पेयजल संकट पैदा कर दिया बल्कि खेती के लिए भी गंभीर संकट पैदा हो रहा है. जमीन के अंदर का पानी निकालने से भूगर्भीय संकट भी पैदा होने की आशंका प्रबल हो रही है. भूगर्भ शास्त्री लगातार इस आशंका के कारण आने वाले समय में भूकंप की चेतावनी जारी कर रहे हैं. खेती का संकट बड़े पैमाने पर बेरोजगारों की फौज खड़ी कर देगा. इस स्थिति में राज्य के सकल उत्पाद पर भी असर पड़ेगा.
राहत की बात यह है कि राज्य में पानी को बचाने को लेकर बहुत कुछ हो रहा है. सरकार पहली बार चापानलों के बदले गांवों में कुओं व तालाबों के रख-रखाव का खर्च उठाने को तैयार हुई है. पानी बचाने के दूसरे उपायों पर स्वयंसेवी संगठनों से लेकर पंचायतें भी सक्रिय हो रही हैं. लेकिन यह सारा काम बिखरा-बिखरा है. अब तक जल संकट से निपटने के सभी तैयारियां अलग-अलग विभाग कर रहे हैं. इससे बात नहीं बनने वाली हैं. पंचायत स्तर पर पानी बचाने से लेकर पानी के समुचित उपयोग का कार्यक्रम बनना चाहिए. राज्य के पेयजल व स्वच्छता विभाग ने गांव के सारे कार्यक्रमों को पंचायती राज के हाथों सौंप दिया है. मुखिया से लेकर वार्ड सदस्य तक को शिक्षित-प्रशिक्षित किया जा रहा है. अब जिम्मेवारी पंचायतों की बनती है. अब तक मुखिया जी से लेकर जिला परिषद के सदस्य चापानलों के लिए विधायक जी का चक्कर लगाते थे. अब निर्णय उनके हाथों में है. फैसला ग्राम सभाओं को करना है. देश भर में जल सप्ताह मनाया जा रहा है. इस दौरान झारखंड में जल की स्थिति पर यह खास अंक पंचायती राज के प्रतिनिधियों को समर्पित है. जल संकट पर केवल चिंता जताने से कुछ नहीं होगा. इस बात को समझने का सही समय यही है. बारिश के पानी को सहेजने के छोटे व गंभीर प्रयास बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
पाठकों की राय पर पंचायतनामा को और पठनीय बनाने की कोशिश की गयी है. पंचायतनामा के अक्षरों को पढ़ने में आ रही दिक्कतों को दूर करने का प्रयास किया गया है. इसके लुक में भी थोड़ा बदलाव किया गया है. उम्मीद है, यह आपको पसंद आयेगा. हर अंक आपके लिए संग्रहणीय बन सके. इसकी कोशिश जारी रहेगी. बस, हमें आप अपनी शिकायतों व सुझाव से अवगत कराते रहें. नमस्कार
संजय मिश्र

प्यासा झारखंड

रांची, वर्ष : 1. अंक : 5. पाक्षिक..16 अप्रैल-30 अप्रैल, 2012
प्यासा झारखंड

रविवार, 30 जून 2013

माटी के लाल हैं बालक महतो

किसान बालक महतो ने खेत को ही अपना कॉलेज विश्वविद्यालय बना लिया और बन गये कृषि वैज्ञानिक. अपनी जमीन खो चुके बालक महतो ने नयी शुरुआत की और खेती में ऐसे मिसाल बने कि पढ़े-लिखे लोग भी उनसे खेती सीखते हैं. मैट्रिक तक की भी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकने वाला रांची के ओरमांझी प्रखंड  का यह किसान आज एक कृषि वैज्ञानिक के रूप में बीएयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में किसानों छात्रों को प्रशिक्षण दे रहा है. उनके योगदान प्रयोग पर ओरमांझी से रोहित लाल की रिपोर्ट :

ची जिले के ओरमांझी प्रखंड के ग्राम कुच्चू के प्रगतिशील किसान बालक महतो ने अपनी मेहनत से अपनी तकदीर लिखी है. खेती कैसे रोजगार का फायदेमंद साधन हो सकती है, यह उनसे सीखा जा सकता है. खेती की बदौलत ही आज उनके बच्चे बेहतर संस्थानों में शिक्षा पा रहे हैं. ऐसा भी नहीं है कि बालक महतो के जीवन में सबकुछ सामान्य रहा. सुगनु गांव में उनके पिता पुरन महतो की 22 एकड़ जमीन थी, जिसे आर्मी के लिए 1974 में सरकार ने अधिग्रहित कर लिया था. उस समय बालक महतो उनका परिवार परेशानियांे से घिर गया.
ऐसे में मैट्रिक पूरा करने से पहले ही इन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी घर के कामकाज में लगना पड़ा. बाद में उन्होंने कुच्चू (महुवाटोली) में तीन एकड़ 86 डिसमिल जमीन खरीदी. उसमें बालक महतो ने गोडा धान, उड़द मड़ुवा की खेती शुरू की. शुरुआती दिनों में दो गाय रखने वाले बालक महतो के पास आज 20 गाय हैं, जिनसे प्रतिदिन 200 लीटर दूध होता है. आज उनके पास 16 एकड़ जमीन है, जिसमें वे धान, सब्जी की वैज्ञानिक विधि से बेहतर खेती कर रहे हैं. ड्रिप इरिगेशन से खेती करने वाले संभवत: वे राज्य के पहले किसान हैं.
बालक महतो ने अपनी मेहनत से अपने लिए संसाधन तैयार किये. आज उनके पास 16 एकड़ कृषि भूमि, कु˜ काटने की मशीन, लेबलर, पॉवर टिलर, धान काटने की मशीन (पॉवर रिपर), स्प्रे मशीन, डेयरी फॉर्म, मुर्गी फॉर्म मछली पालन की बेहतर सुविधाएं हैं.
बीएयू में देते हैं प्रशिक्षण
भले ही बालक महतो ने स्कूली शिक्षा मैट्रिक पास करने से पहले ही छोड़ दी, लेकिन अपने अनुभव प्रयोग की बदौलत वे एक कृषि वैज्ञानिक के रूप में काम करते हैं.
रांची के बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उन्हें विशेष तौर पर आमंत्रित किया जाता है. वे किसानों को बेहतर कृषि के लिए प्रशिक्षण देते हैं. विश्वविद्यालय के छात्र भी उनके अनुभव प्रयोग से सीखते हैं.
बीज तैयार कर
करते हैं आपूर्ति
टमाटर स्वर्ण लालिमा, अर्का आभा, बैगन स्वर्ण श्यामली, स्वर्ण प्रतिभा, फ्रेंचबीन, सोयाबीन, मटर के बीज का उत्पादन कर आइसीएआर के रांची सेंटर (पलांडू) को आपूर्ति कर रहे हैं.