गुरुवार, 6 जून 2013

                               नाम बड़े,दर्शन छोटे



                                                                                 नाम बड़े, दर्शन छोटे
सल्ली प्रखंड कें पांच पंचायत वीडियों कान्फ्रेंसिंग सेवा से जुड गयी हैं. 18 दिसंबर 2011 को राज्य के मुख्यमंत्री अजरुन मुंडा ने सिल्ली प्रखंड मुख्यालय में ई पंचायत क ी शुरुआत की थी. प्रखंड की टुटकी पंचायत को राज्य का सबसे पहला ई पंचायत बनने का गौरव प्राप्त हुआ. टुटकी की महिला मुखिया सुनीता देवी से मुख्यमंत्री ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से बात की थी. सिल्ली के बीडीओ गौरांग महतो के अनुसार टुटकी, लुपुंग, बांसारुली, मुरी पश्चिमी एवं हलमाद में वीडियो कान्फेंसिंग की व्यवस्था है. आवश्यकतानुसार पंचायतों से वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये बात होती है.

पंचायत स्तर पर लापरवाही : विभागीय लापरवाही के कारण पंचायतों में अबतक जेनेरेटर नहीं खरीदे गये हैं. टुटकी राज्य की पहला ई पंचायत है, पर वहां भी अबतक जेनेरेटर नहीं खरीदी गयी है. इस कारण ई पंचायत योजना का समुचित लाभ पंचायतों को नहीं मिल रहा है.  टुटकी के मुखिया सुनीता देवी ने बताया कि बिजली के अभाव में पंचायत में प्रज्ञा केंद्र का भी काम बाधित है. प्रखंड मुख्यालय से सहायता लेनी पडती है. कमोबेश यही स्थिति सभी पंचायतों की है.

बीडीओ का पक्ष : सिल्ली के बीडीओ गौरांग महतो कहते हैं पंचायतों को जेनेरेटर व अन्य सामानों की खरीदारी के लिए करीब पांच लाख रुपये दे दिये गये हैं, पर लापरवाही के कारण अबतक खरीदारी नहीं की गयी है.

(रांची के सिल्ली से विष्णु गिरि की रिपोर्ट)




..तो गलत राह चुन लेंगे प्रतिनिधि



झारखंड में पंचायत निकायों को अबतक पर्याप्त अधिकार स्थानांतरित नहीं किये गये हैं. केंद्र की ओर से संचालित दर्जनों योजनाओं के बेहतर कार्यान्वयन में पंचायत निकायों की भूमिका सबसे कारगर हो सकती है. अगर पंचायत निकायों को पर्याप्त अधिकार दिये जाते हैं, तो इससे व्यवस्था ज्यादा पारदर्शी होने के साथ ही उसमें लोगों की सीधी भागीदारी भी बढ़ेगी. पंचायत निकाय, उनकी भूमिका, राज्य में मनरेगा की स्थिति पर सामाजिक कार्यकर्ता व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भोजन के अधिकार (राइट टू फूड) पर गठित आयोग के सदस्य बलराम सिंह से राहुल सिंह की बातचीत का प्रमुख अंश :



तीन दशक बाद झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था आखिरकार लागू हो गयी. अब आगे इससे क्या उम्मीदें हैं

झारखंड में 32 साल बाद पंचायत चुनाव हुआ है. हम दूसरे राज्यों से सीख लें और  काम करें. हमें अपने संभावित मजबूत पक्ष को चि?ित कर काम करना होगा. आदिवासी क्षेत्र का आधा हिस्सा शिडयूल एरिया (अनुसूचित क्षेत्र) है. हमें उसके लिए काम करना है. ऐसा होगा तभी विकास सही मायने में हो पायेगा. सरकार ने यह जिम्मेदारी यूएनडीपी को दी है. जबकि उसे अपनी दृष्टि स्पष्ट करनी चाहिए. 


पंचायत प्रतिनिधियों को अब तक पर्याप्त अधिकार नहीं मिले हैं, इसको लेकर संशय व संदेह की स्थिति क्यों है?

पंचायती राज व्यवस्था में सबसे पहले पावर ट्रांसफर किया जाना चाहिए. यह चुने हुए जनप्रतिनिधियों का संवैधानिक अधिकार है. अगर कोई सरकार ऐसा नहीं करती है, तो यह गैर संवैधानिक है. ग्रामसभा हमारा स्ट्रेंथ एरिया(मजबूत पक्ष) है. इसे अधिकार दिया ही जाना चाहिए. समुदाय के स्तर पर फैसले लिये जाने की व्यवस्था लागू होनी ही चाहिए. ऐसा होगा तभी सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा. वर्तमान में राज्य सरकार ने व्यक्ति केंद्रित व्यवस्था बना दी है यानी मुखिया को उसके अधिकार नहीं दिये गये, लेकिन उससे चेक पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं. मुख्यमंत्री कुछ कहते हैं, मुख्य सचिव कुछ कहते हैं और होता कुछ और है. मुखिया को अधिकार नहीं देकर सरकार संवैधानिक दलाल खड़ा करने का काम कर रही है. यह खतरनाक है. सरकार खुद को उनका रोल मॉडल बना रही है. मनरेगा में प्रावधान है कि कम से कम 50 प्रतिशत काम पंचायतों के माध्यम से हो, अगर उसकी संरचनात्मक व्यवस्था नहीं करेंगे, तो मुखिया ठेकेदार का काम करेंगे. आदर्श व्यवस्था में ग्रामसभा से योजना पास होनी चाहिए, एक कार्यान्वयन एजेंसी होनी चाहिए. सारे फैसले जिला प्रशासन लेता है. पंचायत अगर शासन की इकाई है और उसके माध्मय से राशि खर्च नहीं होगी, उसे उसका रोजगार से लेकर योजना के क्रियान्वयन तक सीधा फायदा नहीं होगा, तो उससे जुड़े लोग दूसरा तरीका निकालेंगे. यकीन कीजिए वह तरीका गलत होगा. 


तो क्या राजनीतिक वर्ग पंचायत प्रतिनिधियों को अधिकार दिये जाने से स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है

बिल्कुल. अंगरेज भी कहते थे कि आजाद होने पर भारत नहीं चलेगा. इसी तर्क के आधार पर वे हमें आजादी नहीं देते थे. पर, हमने आजादी ली, देश भी चलाया. आज अंगरेजों की तरह ही राजनीतिक वर्ग यानी सरकार का मानना है कि पंचायत प्रतिनिधियों को अधिकार दे देंगे, तो वे व्यवस्था नहीं चला पायेंगे. मैं कहूंगा यह सोच सिरे से गलत है. ऐसे में एक सवाल उठता है कि अगर विधानसभा व संसद में बैठे लोगों से कहा जाये कि आप से देश व राज्य नहीं चल रहा है, आप में से कई गंभीर आरोपों में जेल में बंद हैं, तो आपके पास अधिकार क्यों? या फिर यह कहें कि आपके विधायक व सांसद चुने जाने के दो या तीन साल बाद आपको आपके अधिकार दिये जायेंगे, तो उनका क्या रुख होगा?


अन्य राज्यों का अनुभव क्या बताता है?
पंचायती राज व्यवस्था दोधारी तलवार है. पूरे देश में पंचायतों का अनुभव यही कहता है. जहां उन्हें जिम्मेवार बनाया गया, वहां सारे साधन हैं व उनकी संस्था के प्रति जिम्मेवारी भी है. उसके उलट कई राज्यों में जहां पंचायत निकायों से जुड़े लोगों को पर्याप्त अधिकार नहीं दिये गये, वैसी जगहों पर मुखिया पर पंचायत सेवक भी अधिकार चलाता है.


पंचायत प्रतिनिधियांे को उत्तरदायी कैसे बनाया जा सकता है?
पंचायत प्रतिनिधियों को अगर जिम्मेवारी सौंपी जाती है, तो वे पंचायत व ग्रामसभा के प्रति जवाबदेह बनेंगे. और, बेहतर यही होगा कि उन्हें ग्रामसभा व पंचायत के प्रति ही जवाबदेह बनाना चाहिए न कि ब्लॉक के प्रति. इससे समुदाय के प्रति उनमें उत्तरदायित्व आयेगा. इससे मनरेगा के अलावा ग्रामीण विकास के लिए चलायी जा रही दर्जनों योजनाएं भी सुधरेंगी. उन्हें लगेगा कि यह उनकी योजना है, उनके गांव के विकास के लिए है, इसका सीधा फायदा उन्हें होगा, तो वे जागरूक रहेंगे. इसके अलावा सरकार की लाठी व टेकAोलॉजी व्यवस्था नहीं सुधार सकती एक साल से ज्यादा वक्त में हमने व्यवस्था को सुधारने व सशक्त बनाने के लिए क्या किया है. हम जनप्रतिनिधियों को अधिकार देने में जितना विलंब करेंगे, वह राज्य के लिए उतना ही खतरनाक होगा. अगर वे गलत रास्ते पर चले जाते हैं, तो उन्हें सही रास्ते पर लाना बेहद मुश्किल होगा.


मनरेगा की झारखंड में क्या स्थिति है? इसमें कितनी पारदर्शिता है? 
मनरेगा के सिस्टम में बनायी गयी पारदर्शिता है. यह क्लास के लोगों के लिए है. मेरा मतलब है वैसे लोगों के लिए जो कंप्यूटर पर बैठ कर चीजों को देखते हैं, इंटरनेट पर डाटा व फैक्ट डाउनलोड करते हैं. पर सवाल यह है कि हम पारदर्शिता का मतलब क्या समझते हैं? पारदर्शिता समाज की 70 प्रतिशत उस आबादी के लिए होनी चाहिए, जिससे मनरेगा के श्रमिक आते हैं. जो इसके तहत काम करते हैं और काम मांगते हैं. अभी उनके लिए सीधी पारदर्शिता नहीं हैं. मेरा मानना है कि उस दिशा में प्रयास होना चाहिए. पर, अफसोस वह नहीं हो रहा. भारत सरकार व राज्य की कोशिश में वह है ही नहीं. इसके बावजूद मैं यह कहूंगा कि मनरेगा में सुधार की काफी गुंजाइश है. किसी दूसरे क्षेत्र में इतने मामले नहीं उजागर होते, जितने मनरेगा में. 
पंचायत चुनाव से मनरेगा को थोड़ा फायदा हुआ है. अन्य को नहीं हुआ है. यह एक कानून है, इसलिए इसमें जो व्याख्या की गयी है, उसे लागू करना जरूरी है. बाकी जो कल्याणकारी कार्य हो रहे हैं, वे योजना हंै, इसलिए उनकी उपेक्षा की जा रही है.  


मनरेगा में लोकपाल जैसा तंत्र स्थापित करने से भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगा है?
देखिए, सोशल ऑडिट की व्यवस्था पहले भी रही है. फूड फॉर वर्क (काम के बदले भोजन), पीडीएस (जन वितरण प्रणाली) का भी सोशल ऑडिट किया गया है. राज्य सरकार ने इसे संस्थागत रूप देने की कोशिश की है. सोशल ऑडिट डायरेक्टरेट बनाने का काम चल रहा है. अब लोकपाल जैसी संस्था बनी है, तो उसका ग्रामसभा से सामना होना चाहिए. पर, ज्यादा ऊर्जा व समय खानापूर्ति में चला जाता है. जन सुनवाई में कह दिया जाता है कि शिकायत नहीं मिली. मैं कहूंगा कि पॉजीटिव सोशल ऑडिट हो.


क्या मनरेगा के तहत रोजगार दिवसों की संख्या बढ़नी चाहिए?
एक्ट में न्यूनतम 100 दिन व अधिकतम भी 100 दिन ही रोजगार देने का प्रावधान है. इसके भी कारण व तर्क है. चूंकि तंत्र की खामियों के कारण रोजगार देने का यह तय लक्ष्य भी पूरा नहीं होता, तो उसी को इस तर्क का आधार बना दिया गया है कि चूंकि 100 दिन का रोजगार भी लोग नहीं करते, तो उसे बढ़ाने की क्या जरूरत है.
होता यह है कि आज की तारीख (किसी एक दिन) में ही पांच हजार लोग काम मांगते हैं और उन्हें उसी दिन काम उपलब्ध भी करा दिया जाता है. ऐसा कागज में दिखाया जाता है. ऐसे उदाहरण ही इसकी पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हैं. जबकि होना यह चाहिए कि पहले रोजगार के लिए आवेदन दिया जाये, फिर अर्हताओं व अन्य चीजों की पड़ताल कर देखा जाना चाहिए कि अमुक व्यक्ति उसके लिए पात्र है या नहीं. उसके बाद रोजगार उपलब्ध कराया जाना चाहिए. पारदर्शी व्यवस्था होने से लोगों का जुड़ाव और बढ़ेगा. अगर ऐसा होगा, तो कार्य दिवस बढ़ाने की भी जरूरत प्रत्यक्ष रूप से महसूस होगी.

नौकरशाही से भी पंचायत को अधिकार मिलने में दिक्कतें आ रही हैं?
नौकरशाही घोड़े की तरह है. झारखंड में उस पर राजनीतिक वर्ग की पकड़ नहीं है. इसमें व्यवस्थागत खामियां हैं. अगर आप घोड़े की सवारी नहीं कर सकेंगे, तो वह आप पर ही सवार हो जायेगा. राज्य में रोज मंत्री-सचिव में झगड़े हो रहे हैं, अखबारों में किस्से छप रहे हैं. अगर राजनीतिक पद पर बैठा व्यक्ति स्वच्छ हो तो उस पर नौकरशाह हावी हो सकता है? जनता के चुने हुए प्रतिनिधि पर भला कोई नौकरशाह कैसे हावी हो सकता है. अगर ऐसा हो रहा है, तो यह खतरनाक है. यह स्थिति लोकतंत्र को कहां ले जायेगी. यह भी सवाल उठता है कि नौकरशाहों को यह हैसियत किसने दी. याद रखिए, राजनेता की एक चूक नौकरशाह को हमेशा के लिए हावी बना देती है. 



खोज-खबर


                    कहानी सीटीआइ और पीटीआइ की

फिलहाल राज्य में पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के लिए दो संस्थान संचालित हो रहे हैं. रांची स्थिति सीटीआइ (सेंट्रल ट्रेनिंग इंस्टीटय़ूट) और देवघर के जसीडीह स्थित पीटीआइ (पंचायत ट्रेनिंग इंस्टीटय़ूट). रांची स्थित सीटीआइ फिलहाल सर्ड (स्टेट इंस्टीटय़ूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट) के परिसर में एक गैराजनुमा वर्कशॉप में संचालित हो
रहा है.

प्रशिक्षण के लिए इसे अलग से एक हॉस्टल उपलब्ध कराया गया है. वर्कशॉप में इसके कर्मचारी बैठते हैं, मगर उसकी हालत काफी बुरी है. उसमें बना सीलिंग उखड़ गया है और कभी भी गिर सकता है. इस संस्थान के पास अपना परिसर है, जिसे 2010 में केंद्रीय विवि को दो साल के लिए दे दिया गया है, हालांकि उसे तभी खाली कराया जा सकता है जब विवि का अपना भवन तैयार हो जाये, इसमें कम से कम दो साल का समय तो लगना ही है. ब्रांबे स्थित इस परिसर में छह हॉस्टल हैं जिसमें 250 लोगों के रहने की व्यवस्था है. एक सेंट्रली एसी ऑडिटोरियम है जिसमें 500 लोग बैठ सकते हैं. छह लक्चर हॉल हैं, आठ कमरों वाला एक गेस्ट हाउस है. यह परिसर 54 एकड़ में फैला है. इतने बेहतर संसाधन के बावजूद यह संस्थान फिलहाल लगभग सड़क पर है.

देवघर स्थित पंचायत प्रशिक्षण संस्थान की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है. यहां प्रशिक्षण हॉल, कार्यालय भवन, प्रशासनिक भवन, बड़ा ऑडिटोरियम, छात्रवास, वीआइपी छात्रवास, स्टॉफ क्वार्टर आदि है. मगर इसे प्रशिक्षण का काम ही नहीं दिया जाता है. इस संस्थान को अब तक दो सौ से भी कम पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित करने का काम दिया गया है. फिलहाल इसका कैचमेंट एरिया काफी बड़ा है. संताल परगना और कोयलांचल के दस जिले का क्षेत्र इसके अंदर आता है, जिसमें देवघर, दुमका, गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज, जामताड़ा, बोकारो, धनबाद, कोडरमा और गिरिडीह जिले आते हैं. यहां प्राचार्य समेत दो व्याख्याता, तीन प्रखंड पंचायतीराज पदाधिकारी, एक चिकित्सक, दो क्लर्क, एक चतुर्थवर्गीय स्टाफ, दो ग्राम रक्षा दल के कर्मी का पद रिक्त है



यूं चला पंचायत प्रतिनिधियों का प्रशिक्षण

यूएनडीपी के अधिकारी विनय दुबे के अनुसार यह पंचायत प्रशिक्षण का पहला चरण एक अगस्त 2011 से 15 फरवरी 2012 तक चलाया जा रहा है. इसके लिए 27 एजेंसियों को सहयोग के लिए चुना गया है. जिनमें से कुछ सरकारी और कुछ गैर सरकारी संस्थाएं हैं. इन संस्थानों का चयन आवेदन करने वाली 120 संस्थाओं के बीच से किया गया. फिर इन्हें  प्रशिक्षण देकर प्रत्येक एजेंसी को 2 जिले से लेकर 3 ब्लॉक तक की जिम्मेदारी सौंपी गयी.
दुबे बताते हैं कि इसके लिए इन एजेंसियों के 180 मास्टर ट्रेनरों को एटीआइ (एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रेनिंग इंस्टीटय़ूट) में प्रशिक्षण दिया गया. फिर इन मास्टर ट्रेनरों ने अपनी एजेंसियों के अन्य ट्रेनरों को प्रशिक्षित किया. प्रशिक्षण का कार्यक्रम ब्लॉक स्तर पर चलाया गया. एक ब्लॉक के प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी तीन ट्रेनरों की थी. रांची स्थित सीटीआइ के जिम्मे रांची के छह ब्लॉक और पंचायत समिति सदस्यों के प्रशिक्षण का काम था,
जबकि देवघर स्थित पीटीआइ के हिस्से पूरे देवघर जिले के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी थी.
मुखिया और पंचों के प्रशिक्षण की व्यवस्था जहां ब्लॉक मुख्यालयों में थी वहीं उससे ऊपर के प्रतिनिधियों को जिला मुख्यालय में आवासीय ट्रेनिंग दी गयी. ब्लॉक स्तर पर चले प्रशिक्षण अभियान का बजट 350 रुपये प्रति प्रतिनिधि प्रति दिन रखा गया है.

इस तरह राज्य के ऐसे लगभग 49 हजार प्रतिनिधियों को तीन दिन के प्रशिक्षण का बजट लगभग 5 करोड़  साढ़े 14 लाख रुपये है, जिसमें 100 रुपये प्रति प्रतिनिधि प्रति दिन सिटिंग अलाउंस(बैठने का भत्ता) है और 30 रुपये आने-जाने का किराया. जिला स्तर पर हुई आवासीय ट्रेनिंग का बजट 680 रुपये प्रति प्रतिनिधि प्रति दिन है. यानी 4423 प्रतिनिधियों के हिसाब से तीन दिन का नब्बे लाख 22 हजार नौ सौ बीस रुपये

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                                      पंचायत प्रशिक्षण केंद्र खस्ताहाल

                                                          नौ में से सात बंद

पुष्यमित्र

झारखंड के नव निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण का पहला चरण समाप्ति की ओर है. पिछले छह माह से चल रहे इस प्रशिक्षण को पूरा करने के लिए पंचायती राज निदेशालय लगभग पूरी तरह गैर सरकारी एजेंसियों पर निर्भर रहा. प्रशिक्षण कार्य के प्रबंधन और समन्वय की जिम्मेदारी जहां यूएनडीपी (यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम) के हाथों है, वहीं जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण को अंजाम देने के लिए  27 अलग-अलग एजेंसियों की सहायता ली गयी है, जिनमें से अधिकतर गैर सरकारी संस्थाएं हैं. निदेशालय द्वारा उठाया गया यह कदम एक ऐसे राज्य के लिए विडंबना है जहां हाल तक नौ पंचायत प्रशिक्षण संस्थान कार्यरत थे. ये केंद्र रांची, देवघर, गुमला, पश्चिम सिंहभूम, पलामू, हजारीबाग, धनबाद, गिरिडीह और साहिबगंज में स्थित थे. इन संस्थानों में से सात को महालेखा निरीक्षक की आपत्तियों के बाद 2007 में पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव के आदेश पर बंद कर दिया गया है. आपत्तियां यह थीं कि इन केंद्रों पर अनावश्यक खर्च हो रहा है. सवाल यह उठता है कि क्या उस वक्त राज्य सरकार पंचायत व्यवस्था लागू करने के बारे में नहीं सोच रही थीं.

सरकार को एजी के सामने यह तर्क तो रखना चाहिये था कि राज्य बहुत जल्द पंचायत चुनाव कराने जा रहा है, ऐसे में इन केंद्रों की जरूरत पड़ेगी. ऐसा ही हाल रांची स्थित केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थान(सीआइटी) का हुआ. इसके परिसर को  2010 में  केंद्रीय विश्वविद्यालय को दे दिया गया. यह मानते हुए कि इस संस्थान को कोई खास उपयोगिता नहीं है. इस  कारण फिलहाल यह संस्थान बेघरों जैसी हालत में है. देवघर स्थित पीआइटी की कहानी तो अलग ही है. पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद इसे प्रशिक्षण का काम नहीं दिया जा रहा. यहां दस जिलों के पंचायत सेवकों को प्रशिक्षण दिया जाता है, मगर जब पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने की बात आती है तो उसे महज देवघर जिले के प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी दी जाती है.

पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े प्रशिक्षण के कामकाज को अंजाम देने के उद्देश्य से बने इन अनुभवी संस्थानों को नयी व्यवस्था में अनुपयोगी मान लिया गया है. दोनों संस्थानों को जमीनी स्तर के प्रशिक्षण की छोटी-छोटी जिम्मेदारियां दी गयी हैं. प्रशिक्षण सामग्री तैयार करने से लेकर प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण देने तक के काम काज में इनकी कोई मदद नहीं ली गयी. मौजूदा प्रशिक्षण का काम संभाल रहे यूएनडीपी के अधिकारी कहते हैं कि अगर इन संस्थानों के भरोसे प्रशिक्षण की योजना बनी होती तो जो काम महज छह माह में पूरा हुआ वह अगले पांच सालों में भी शायद ही पूरा हो पाता. वे इसकी वजह इन संस्थानों में कुशल प्रशिक्षकों का अभाव और इनके काम करने के सरकारी रवैये को मानते हैं. लिहाजा प्रशिक्षण के लिए पीपीपी मोड को ही सबसे उपयुक्त बताते हैं.
सीटीएस के एक प्रशिक्षक बताते हैं, यूएनडीपी द्वारा चलाये जा रहे प्रशिक्षण अभियान की गुणवत्ता खुद सवालों के घेरे में है. अधिकतर प्रशिक्षकों की पंचायती राज व्यवस्था के बारे में न्यूनतम जानकारी होने की वजह से वे प्रशिक्षण के दौरान उठने वाले सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे. यह प्रशिक्षण अभियान आनन-फानन में समाप्त तो हो गया, मगर प्रतिनिधियों ने क्या सीखा यह सवाल अनुत्तरित है.
राज्य के प्रशिक्षण संस्थानों के ट्रेनर वर्षों से यह काम करते आये हैं, ऐसे में उनके द्वारा यह काम करवाया जाता तो अधिक कारगर रहता.

हालांकि सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली हमेशा संदिग्ध रही है, मगर हमारे पड़ोसी राज्य बिहार में जहां 2001 से पंचायती राज व्यवस्था लागू है, सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों पर ही भरोसा जताया गया है. वहां हर जिले में पंचायत प्रशिक्षण केंद्र खोले गये हैं. हर केंद्र में एक प्राचार्य और दो व्याख्याता नियुक्त किये गये हैं.

विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रतिनिधियों को पंचायती राज अधिनियम से जुड़े अपने अधिकार और कर्तव्य, योजनाओं की रूपरेखा तैयार करना, उन्हें लागू कराना, सरकारी योजनाओं के लाभ, उनका लाभ लेने के तरीके आदि की जानकारी देना प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य है. ऐसे में दो-चार दिन के कैंप से उनकी जरूरत पूरी नहीं होने वाली. इस सतत प्रक्रिया को संचालित करने के लिए एक स्थायी संस्थान ही बेहतर उपाय है.

फिलहाल राज्य के तीन प्रमंडल मुख्यालयों पलामू, चाइबासा और हजारी बाग में प्रशिक्षण संस्थान खोले जाने की योजना है. बाद में केंद्र सरकार के जिला ग्रामीण विकास योजना के तहत हर जिले में प्रशिक्षण केंद्र खोले जायेंगे. सीआइटी के प्रशासनिक भवन की मरम्मत के लिए सर्ड को राशि उपलब्ध करा दी गयी है. उन्होंने कहा कि जब केंद्रीय विवि का अपना भवन तैयार हो जायेगा, तो सीआइटी को उसका भवन मिल जायेगा. इससे स्थिति बेहतर होगी.  गणेश प्रसाद
पंचायती राज निदेशक

आमुख कथा
पंचायतनामा डेस्क
लंबे इंतजार व संघर्ष के बाद राज्य में पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई है, मगर इसका लाभ तभी मिल पायेगा जब हम इस व्यवस्था को ठीक तरह से समझ पायेंगे. चाहे मुखिया हो या जिला परिषद अध्यक्ष या फिर आम ग्रामीण सबको यह पता होना चाहिए कि इस कानून के अंदर उन्हें क्या-क्या अधिकार मिले हैं. साथ ही उनसे क्या-क्या अपेक्षा की जाती है. पंचायतनामा के जरिये आपके अधिकार और कर्तव्यों के बारे में हम आपको नियमित जानकारी देना चाहते हैं. इसी सिलसिले में पहली कड़ी के रूप में हम यह जानकारी सवाल-जवाब के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं.
त्रिस्तरीय पंचायती राज निकाय क्यों कहा जाता है? इसके तीन स्तर से क्या मतलब निकलता है, क्या तीनों स्तर एक-दूसरे से जुड़े हैं?

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करती है. जैसा कि आपने चुनाव के दौरान भी महसूस किया होगा कि आपने तीन स्तर पर प्रतिनिधियों को चुना. पंचायत के लिए, ब्लॉक के स्तर पर और जिला स्तर पर. पंचायत के स्तर पर वार्ड सदस्य और मुखिया होते हैं. प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति सदस्य और प्रमुख होते हैं, वहीं जिला स्तर पर जिला परिषद सदस्य और उनके अध्यक्ष(जिला परिषद अध्यक्ष). जैसा कि आप जानते हैं हर ग्राम पंचायत कई वाडरें से बनता है, उसी तरह पंचायत समिति और जिला परिषद के क्षेत्र अलग-अलग होते हैं. आप जिन लोगों को पंचायत समिति सदस्य के रूप में चुनते हंै, वे ही प्रमुख को चुनते हैं. उसी तरह जिला परिषद अध्यक्ष को हमारे द्वारा चुने गये जिला परिषद सदस्य चुनते हैं. ग्राम पंचायत व पंचायत समिति को जिला परिषद से संबद्ध किया गया है, लेकिन तीनों ही निकाय अलग-अलग फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं.
ग्राम पंचायत व ग्रामसभा में क्या अंतर है. ग्रामसभा की कौन-सी विशेषता उसे लोकसभा, विधानसभा से भी विशिष्ट बनाती है?

ग्राम पंचायत पंचायती राज व्यवस्था की आधारभूत इकाई है, इसके सभी सदस्य वार्ड क्षेत्रों से निर्वाचित होते हैं. पर, जब ग्राम पंचायत की बैठक बुलायी जाती है, तो उस बैठक को ग्रामसभा कहते हैं. ग्रामसभा के सदस्य पंचायत के सभी मतदाता होते हैं. मगर लोकसभा या विधानसभा के सदस्य सभी मतदाता नहीं बल्कि उनके द्वारा चुने गये प्रतिनिधि होते हैं. आप अपनी बात ग्रामसभा में तो सीधे उठा सकते हंै, पर लोकसभा और विधानसभा में अपने प्रतिनिधियों के जरिये ही अपना पक्ष रख सकते  हंै. लोकसभा, विधानसभा, जिला परिषद व पंचायत समिति की बैठक में उसके निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं, उनकी संख्या कोरम का आधार होती हैं और नियम भी वही बनाते हैं व फैसले भी वही लेते हैं.
पंचायतों के गठन का आधार क्या होता है?
सरकार किसी स्थानीय क्षेत्र जिसमें एक या अधिक गांव व टोले शामिल हो, को ग्राम पंचायत घोषित कर सकती है. पंचायत क्षेत्र की आबादी पांच हजार के लगभग होनी चाहिए. अगर एक पंचायत में दो या अधिक गांव हों तो सबसे अधिक जनसंख्या वाले गांव का नाम ही पंचायत का नाम होगा. जिलाधिकारी को पंचायतों के स्वरूप में बदलाव करने का अधिकार है. वह पंचायत क्षेत्र के नाम में भी परिवर्तन कर सकता है.
ग्राम पंचायत की कार्य अवधि क्या है?

ग्राम पंचायत की कार्य अवधि पांच साल की होती है. समय की गिनती पहली ग्राम सभा के दिन से शुरू होती है. अगर किसी ग्राम पंचायत को किसी कारण से विघटित कर दिया जाता है, तो विघटन के छह महीने के अंदर चुनाव करवा कर उसका गठन करवाना होता है.

केस स्टडी

1 गाड़ीखास पंचायत में पहुचंने पर आप महसूस करेंगे कि पंचायत चुनाव के बाद हमारे गांव बदल रहे हैं. यहां का पंचायत सचिवालय नवीनतम सूचनाओं से अपडेट है. पंचायत स्तर के काम का निबटारा पंचायत मुख्यालय में ही होता है. लोगों को उसके लिए प्रखंड मुख्यालय पड़वा नहीं जाना पड़ता है. प्रत्येक बुधवार को पंचायत सचिवालय में मुखिया, पंचायत सचिव व रोजगार सेवक उपस्थित रहते हैं. ये लोगों की समस्या सुनते हैं व उसे दूर करने की पहल भी करते हैं.

पंचायत में कौन-सी योजना चल रही है. इलाके के ऐसे लोग जो गरीबी रेखा से नीचे हैं, उनका नाम व क्रमांक पंचायत सचिवालय की दीवार पर अंकित है. पंचायत सचिवालय में इंदिरा आवास, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन से जुड़े मामले निबटाये जाते हैं. पंचायत के लिए योजनाओं का चयन ग्रामसभा के माध्यम से किया जाता है. अगर योजनाओं की सूची लंबी होती है, तो उसकी प्राथमिकता तय की जाती है. चल रही योजनाओं को लेकर अपडेट जानकारी कि उसके लिए कितना काम हुआ है, कितना होना बाकी है, पंचायत सचिवालय के पास है. पंचायत के युवा मुखिया प्रमोद यादव कहते हैं कि हम सामूहिक प्रयास से अपनी पंचायत को आदर्श पंचायत बनाने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले दिनों पलामू उपायुक्त पूजा सिंघल ने इस पंचायत का दौरा कर इसकी तारीफ की थी व कहा था कि गाड़ीखास पंचायत की तरह अन्य पंचायतें भी हो जायें, तो प्रखंड कार्यालय पर दबाव कम होगा. इससे विकास की गति भी तेज होगी.
(पलामू से अविनाश की रिपोर्ट)


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 गढ़वा प्रखंड की पंचायत समिति की बैठक अबतक पांच बार हुई है. इन बैठकों में मनरेगा, शिक्षा, पेयजल एवं आंगनबाड़ी केंद्रों से संबंधित निर्णय लिये गये. पर, इन बैठकों में लिये गये निर्णय पर अबतक कार्रवाई नहीं के बराबर हुई है. पंचायत समिति की बैठकों में सामान्यत: अधिकारी उपस्थित नहीं रहते हैं. विकास योजनाओं की स्वीकृति के लिए पंचायत समिति से मंजूरी नहीं ली जाती है. पंचायत समिति के सदस्यों का कहना है कि उन्हें पंचायत राज से संबंधित अधिकार नहीं मिले हैं और बैठक सिर्फ कानूनी बाध्यता के कारण की जा रही है. पंचायत समिति के पास अपना कोई भवन नहीं है. प्रखंड कार्यालय के ही एक भवन में प्रमुख के बैठने की व्यवस्था की गयी है. सिर्फ प्रमुख व उपप्रमुख को सात-सात माह का मानदेय मिला है. पंचायत समिति संघ के अध्यक्ष व पंचायत समिति सदस्य संजय तिवारी कहते हैं कि यहां अफसरशाही हावी है और पंचायत प्रतिनिधि अबतक उपेक्षित हैं.   (गढ़वा से जितेंद्र सिंह की रिपोर्ट)


अन्य जिला परिषदों की तरह हजारीबाग जिला परिषद भी व्यवस्थति नहीं हो सकी है.  डीआरडीए की जिम्मेवारी भी नहीं मिली है. प्रस्तुत है बैठकों व कामकाज का ब्योरा :

आमुख कथा
पंचायतनामा डेस्क

झारखंड में पंचायत राज निकाय के गठन के बाद से सबसे ज्यादा चर्चा पंचायत राज जनप्रतिनिधियों को मिलने वाले अधिकारों की है. राजनीतिक दल, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया व अन्य कई फोरमों पर इसको लेकर बहस जारी है. भारतीय संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में 29 ऐसे विषय हैं, जिनसे संबंधित अधिकार व उसके तहत होने वाले कामकाज की जिम्मेवारी सीधे पंचायत निकायों को दी जानी चाहिए. पर, झारखंड में पंचायत निकायों के गठन के 13 महीने बाद तक उन्हें महज पांच विषयों से जुड़े अधिकार ही मिले हैं. इन पांच अधिकारों से भी राज्य की सभी पंचायतें लाभान्वित नहीं हो पा रही हैं. मसलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम व खेलकूद के लिए मात्र 400 पंचायतों को ही जारी वित्तीय वर्ष में थोड़ा-बहुत लाभ मिला सका, जबकि चार हजार से ज्यादा पंचायत इससे वंचित रहीं. मनरेगा के तहत होने वाले काम पंचायतों को दिये गये हैं, पर  ग्रामसभा की ओर से मनरेगा मद से अनुशंसित हजारों योजनाएं राज्य में लंबित हैं. दरअसल, जनप्रतिनिधि किसी योजना के तकनीकी पक्ष को अच्छी तरह से नहीं समझ पा रहे हैं. अगर ग्रामसभा द्वारा मनरेगा के प्रावधानों के तहत योजना पारित नहीं की गयी, तो जाहिर है उस पर अमल नहीं हो सकेगा.

पंचायती राज निकाय से जुड़े जनप्रतिनिधि को  झारखंड में पंचायत राज कानून 2001 के तहत निरीक्षण, दिशा-निर्देश व अपने पंचायत क्षेत्र, पंचायत समिति क्षेत्र व जिला परिषद क्षेत्र में व्यवस्था बनाये रखने का हक है. वे संबंधित विभाग से जानकारी ले सकते हैं व त्रुटियों की ओर जिम्मेवार अधिकारी या कर्मी का ध्यान खींच सकते हैं. सरकारी संपत्ति को अतिक्रमण से बचाना, सामुदायिक कार्यो में अपनी इच्छा से सहयोग करना, खुले पशुओं के विरुद्ध कार्रवाई व उसकी रोकथाम, ग्रामीण स्वच्छता को बढ़ावा देना आदि जैसे कार्य खुद की प्रेरणा से भी किये जा सकते हैं. इनके लिए ग्राम पंचायतें अपने अधिकार क्षेत्र में अपने स्तर पर भी एक व्यवस्था बना सकती हैं.
हालांकि यह बेहद जरूरी है कि उन्हें वे अधिकार भी स्थानांतरित किये जायें, जिसके माध्यम से वे वित्तीय मामलों पर व योजनाओं के क्रियान्वयन में सीधी भागीदारी निभा सकें. हेमंत सोरेन राज्य सरकार के पहले ऐसे मंत्री हैं, जिन्होंने अपने विभाग के कई अधिकार पंचायत निकायों को स्थानांतरित किये. पंचायत चुनाव संपन्न होने के तेरह महीनों में झारखंड में पंचायत निकायों को मनरेगा, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ), लाडली लक्ष्मी योजना व ग्रामीण जलापूर्ति योजना जैसे काम सौंपे गये हैं. जिला जल एवं स्वच्छता मिशन का अध्यक्ष जिला परिषद अध्यक्ष व जल एवं स्वच्छता समिति का अध्यक्ष मुखिया को बनाया गया है. साथ ही पानी के लिए जागरूकता लाने के लिए जल सहिया का चयन भी ग्रामसभा के माध्यम से हो रहा है. इसके अलावा पाइका खेलकूद(पंचायत युवा क्रीड़ा एवं खेल अभियान), आपदा राहत कोष के लिए दो लाख रुपये व ग्राम पंचायत को पांच लाख, पंचायत समिति को दस लाख व जिला परिषद को 25 लाख रुपये तक की योजनाओं की स्वीकृति देने का भी अधिकार दिया गया है. हालांकि पाइका के तहत जारी वित्तीय वर्ष में 400 ग्राम पंचायतों को ही राशि उपलब्ध करायी जा सकी है. विभाग की कोशिश है कि अगले वित्तीय वर्ष में 1000 और ग्राम पंचायतों को इस योजना से जोड़ दिया जाय. 13वें वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुरूप वित्तीय वर्ष 2010-2011 व 2011-2012 में केंद्र से आये 400-400 करोड़ रुपये पंचायत राज निकायों को आवंटित किये गये. हालांकि यह दिगर बात है कि खर्च कितना हुआ.

झारखंड में पंचायत राज विभाग के निदेशक गणोश प्रसाद कहते हैं कि जिला परिषद अध्यक्ष कई महत्वपूर्ण समितियों के अध्यक्ष व सदस्य होते हैं, उन्हें इस रूप में विभिन्न विभागों की योजनाओं के निर्माण व अनुमोदन का अधिकार है. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो केंद्रीय सहायता रुक सकती है. गणोश प्रसाद के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्र में आने वाली पंचायतों में लघु वन उपज का अधिकार पंचायत निकाय को देने के संबंध में संशोधन की प्रक्रिया जारी है. बीआरजीएफ  व मनरेगा के तहत पंचायत निकायों के माध्यम से होने वाले कार्यो की अधिसूचना जारी की गयी है.

..बदलाव की बेचैनी

पंचायत निकायों को लेकर सरकारी स्तर पर समन्वय व संवादहीनता का आलम यह है कि कई जिलों में जिला योजना समिति की पहली बैठक पंचायत निकाय के गठन के  साल भर बाद हुई. पाकुड़ में तो अधिकार नहीं मिलने से नाखुश जिला परिषद सदस्यों ने जिला परिषद की बैठक का बहिष्कार भी किया है. ग्राम स्वराज मंच के अध्यक्ष अशोक भगत कहते हैं कि सरकार पंचायत निकायों को अधिकार स्थानांतरित कर रही है. नवंबर में ग्रामसभा महापंचायत के आयोजन के बाद इसमें तेजी आयी है. वहीं मंच के संयोजक शिव शंकर उरांव कहते हैं कि हमारी कोशिश है कि गांव जागृत हों व वहां के लोग विकास योजनाओं में सीधे भागीदार बनें. ग्राम स्वराज मंच ने महात्मा गांधी ग्राम स्वराज दूत बनाने का भी नया प्रयोग शुरू किया है. मंच गांव के लोगों को इसके लिए एक पहचान पत्र जारी करता है व उन्हें विकास योजनाओं पर निगरानी रखने व गड़बड़ी पाये जाने के बाद उसकी सूचना देने के लिए प्रशिक्षण भी दे रहा है.

मालूम हो कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश कई बार राज्य में ग्रामीण विकास योजनाओं की सुस्त गति व गड़बड़ियों पर चिंता व नाराजगी प्रकट कर चुके हैं. बीते वर्ष जब कुछ पंचायत प्रतिनिधि उनके पास शिकायत रखने दिल्ली पहुंचे तो उस समय उन्होंने राज्य सरकार द्वारा नियमावली नहीं बनाने व अधिकारों का हस्तांतरण नहीं किये जाने की स्थिति में केंद्रीय सहायता रोकने की चेतावनी दी थी. केंद्रीय पंचायती राज मंत्री वी किशोर चंद्र देव ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर राज्य में पंचायती राज व्यवस्था की मशीनरी को दुरुस्त करने को कहा. देव ने चार नवंबर 2011 को लिखे अपने पत्र में कहा कि राशि के उचित प्रवाह व विकास योजनाओं में गति लाने के लिए पंचायत निकायों को मजबूत करने की जरूरत है. उन्होंने अपने पत्र में कहा था कि ऐसा नहीं करने पर राज्य को नुकसान होगा. उसके बाजवूद स्थिति नहीं बदली है.

केंद्रीय पंचायती राज मंत्रलय की रिपोर्ट बताती है कि देश की 25 प्रतिशत पंचायतों के पास अपना भवन नहीं है. ऐसे में डाटा बेस रखने, योजना बनाने उनकी निगरानी करने में दिक्कतें आती हैं. झारखंड में यह आकड़ा इससे भी काफी पीछे है. सरकारी दावा है कि राज्य की 4565 पंचायत में 2100 में पंचायत भवन या तो बन गये हैं या उनका निर्माण अंतिम चरण में हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इस जुदा है.  ई-पंचायत योजना से पिछले वित्तीय वर्ष में ही राज्य की 1610 पंचायतों को जोड़ने का लक्ष्य था. पर, राज्य लक्ष्य से काफी पीछे है. सरकार जारी वित्तीय वर्ष के दिसंबर में रांची जिले की टुटकी पंचायत को ई तकनीक से जोड़ कर इस योजना की शुरुआत कर सकी.


पंचायत निकायों को मिलनेवाले अधिकारों की मौजूदा स्थिति

कृषि, प्रसार सहित-प्रक्रिया जारी
भू-सुधार एवं मृदा संरक्षण--
लघु सिंचाई, जल प्रबंधन एवं संभरण विकास-अधिकार प्राप्त
पशुपालन, दुग्धशाला एवं मुर्गीपालन--
मत्स्यपालन--
सामाजिक वानिकी एवं फॉर्म वानिकी--
लघु वन उत्पाद- मिल सकता है
खाद्य संसाधन उपयोगों सहित लघु उद्योग--
खादी, ग्राम एवं कुटीर उद्योग--
ग्रामीण विकास--
पेयजल-अधिकार प्राप्त
ईंधन--
सड़कें, पुलिया, सेतु घाट जलमार्ग एवं संचार --
विद्युत वितरण सहित ग्रामीण विद्युतीकरण--
ऊर्जा के गैर परंपरागत स्नेत--
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम--
प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों सहित शिक्षा--
तकनीकी प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा--
प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा--
पुस्तकालय--
बाजार एवं मेले--
सांस्कृतिक क्रियाकलाप व खेलकूद-आंशिक
प्राथमिक चिकित्सा केंद्र एवं स्वास्थ्य व स्वच्छता-प्रक्रिया जारी
परिवार कल्याण--
महिला एवं बाल कल्याण--
कमजोर वर्गो का कल्याण, विशेषकर एससी -प्रक्रिया जारी
जल वितरण व्यवस्थाअधिकार प्राप्त
सामुदायिक संपत्ति अनुरक्षण-अधिकार प्राप्त



                           आमुख कथा

केस स्टडी-1

पलामू में मनरेगा की सैकड़ों योजनाएं लंबित हैं. वहां की डीसी ने इस संबंध में डीडीसी व मनरेगा प्रभारी से रिपोर्ट तलब की है. कहा जा रहा है कि इनमें से बहुत सी योजनाओं को ग्रामसभा ने मनरेगा के प्रावधानों के अनुरूप पारित नहीं किया है. ऐसे में योजनाएं तकनीकी समस्या के कारण लंबित हैं.

केस स्टडी-2

चतरा जिले के लावालौंग प्रखंड की लमटा पंचायत में ही सभी विवादों का निबटारा होता है. पंचायत चुनाव के बाद इस पंचायत का अबतक एक भी मामला कोर्ट या पुलिस के पास नहीं पहुंचा है. यह पंचायत प्रतिनिधियो के प्रयास का नतीजा है.  इसी तरह बोकारो जिले के कसमार पंचायत में ग्राम सभा वर्षो पुराने जटिल मामलों को सहजता से सुलझा रही हैं

राहुल सिंह

दो केस स्टडी सरकारी मशीनरी की सुस्त चाल व ग्राम पंचायतों की संभावनाओं को बयां करती हैं. अगर पलामू में ग्रामसभा की ओर से मनरेगा की योजनाओं को पारित करने के दौरान उन्हें सरकारी कर्मी ने मनरेगा के तकनीकी पक्ष से अवगत कराया होता, तो इनमें से ज्यादातर योजनाएं पूरी हो जातीं, जिससे जिले के सैकड़ों गांव लाभान्वित होते. दूसरा उदाहरण यह बताता है कि पंचायत निकायों व उनसे जुड़े जनप्रतिनिधियों में कितनी संभावनाएं हंै. कैसे वे अपने यहां के विवाद को सुलझाते हुए अदालत व पुलिस पर से बोझ कम कर सकते हैं. साथ ही विकास में भी सक्रिय साङोदारी निभा सकते हैं.


पहली स्थिति लंबे समय तक पंचायत निकायों का गठन नहीं होने, गठन के बावजूद जनप्रतिनिधियों को उचित प्रशिक्षण नहीं मिलने व पारदर्शिता के अभाव एवं अफसरशाही के कारण हुई. महात्मा गांधी को इस बात का अहसास था, शायद इसलिए उन्होंने यंग इंडिया में लिखा था कि अगर पंचायतें अनियमित रहीं तो वे अपने ही भार से गिर कर टूट जायेंगी. कमोबेश बीते तीन दशकों में यही हाल झारखंड के गांवों-पंचायतों का रहा.
झारखंड एकमात्र राज्य रहा, जहां पेसा कानून लागू होने के बावजूद भी लंबे समय तक पंचायत चुनाव नहीं हुआ. 1996  में बनाये गये पेसा (पंचायत उपबंध का अनुसूचित क्षेत्र में विस्तार) कानून का प्रारूप तैयार करने वाली समिति के सदस्य रहे बंदी उरांव कहते हैं कि अगर पेसा कानून सही ढंग से लागू कर दिया जाये, तो राज्य में नक्सल व माओवाद जैसी गंभीर समस्या का भी बहुत हद तक समाधान हो जायेगा. उरांव कहते हैं कि पंचायत राज व्यवस्था व पेसा कानून में शक्तियां गांव के लोगों के पास हैं और यह विकास के लिए जरूरी भी है, इसलिए शक्तियों के हस्तांतरण को लेकर सरकारी तंत्र परेशान है.

32 वर्ष के बाद तमाम दबावों व विवशता के परिणामस्वरूप पंचायत चुनाव हुआ, पर उसके बाद भी हमारी पंचायती राज संस्थाएं सही ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं. राज्य सरकार की ओर से पंचायतों को दिये जाने वाले अधिकारों के हस्तांतरण की प्रक्रिया धीमी है. यह धीमापन ऊब के साथ आक्रोश को भी जन्म दे रहा है. इसकी झलक जनवरी में उस समय देखने को मिली जब रांची जिला योजना समिति की बैठक के दौरान रांची जिला परिषद की अध्यक्ष सुंदरी तिर्की राज्य के पंचायती राज मंत्री सुदेश महतो से पंचायत प्रतिनिधियों को अधिकार व सुविधाएं नहीं मिलने पर उलझ पड़ीं. हालांकि मंत्री ने तब  उन्हें यह कह कर शांत कर दिया कि वे इस विषय को बाद में देखेंगे और हल निकालेंगे.  पर, यह अकेला वाकया नहीं है. जनवरी मध्य में कोडरमा जिले के पंचायतों के मुखिया सड़क  पर उतर गये व सरकार व प्रशासन के खिलाफ अपने गुस्से का प्रदर्शन करते हुए उपायुक्त को ज्ञापन दिया और अपने अधिकारों की मांग की. मुखिया की पीड़ा है कि जब वे ग्रामसभा की बैठक के माध्यम से योजनाओं का चयन कर प्रखंड मुख्यालय भेजते हैं, तो बीडीओ द्वारा उन्हें बताया जाता है कि इस योजना का चयन उनके द्वारा नहीं होगा, क्योंकि उन्हें इस काम का अधिकार ही अबतक नहीं मिला है. झारखंड राज्य पंचायत परिषद के प्रवक्ता व सरायकेला खरसावां जिला परिषद के उपाध्यक्ष देवाशीष राय कहते हैं कि पंचायत प्रतिनिधियों को अबतक केंद्र के महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों मनरेगा व बीआरजीएफ के कार्य के अधिकार मिले हैं. राज्य स्तर पर पंचायत राज प्रतिनिधियों को जो अधिकार दिये जाने हैं, उसमें ज्यादातर राज्य के दो उपमुख्यमंत्रियों सुदेश महतो व हेमंत सोरेन के विभागों से संबद्ध हैं.

केस स्टडी-2



इनमें से हेमंत सोरेन के विभाग पेयजल एवं स्वच्छता से संबद्ध कई अधिकार पंचायत निकायों को स्थानांतरित किये गये हैं, जबकि सुदेश महतो के विभाग के  अधिकार पंचायत निकायों को ढंग से अबतक स्थानांतरित नहीं किया गया है. राय एक ही सरकार के दो सबसे ताकतवर मंत्रियों के अलग-अलग रुख पर भी आश्चर्य प्रकट करते हैं.
पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने के काम से जुड़े ग्राम स्वराज अभियान के अशरफी नंद प्रसाद कहते हैं कि राज्य में लंबे समय तक पंचायती राज संस्था के निष्क्रिय बने रहने का खामियाजा यह है कि आज ज्यादातर चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अपना अधिकार पता नहीं है. हालांकि उनके अंदर इस बात की काफी जिज्ञासा है कि काम कैसे होगा व उन्हें पॉवर (अधिकार) कैसे मिलेगा.
केंद्रीय पंचायती राज मंत्रलय की ओर से वर्ष 2011-16 के लिए पंचायती राज व्यवस्था के लिए बनाये गये रोडमैप में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे पंचायत प्रतिनिधियों की बड़ी संख्या है, जो कम पढ़े-लिखे हैं और अपनी भूमिका, जिम्मेवारी, कार्यक्रम व तंत्र के बारे में नहीं जानते. इसलिए बेहतर पंचायती राज व्यवस्था के लिए
उन्हें समय-समय पर प्रशिक्षण देने की जरूरत है.
गुमला जिले की कामडारा पंचायत की मुखिया नूतन टोपनो कहती हैं कि मनरेगा व बीआरजीएफ (पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष) के तहत उन्हें काम के कुछ अधिकार मिले हैं. प्रशासन से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने का दुख व्यक्त करते हुए वे बताती हैं कि शिक्षा, कृषि सहित अन्य क्षेत्रों से संबंधित अधिकार अबतक उन्हें नहीं मिले हैं.
स्थिति यह है कि राज्य की ज्यादातर   पंचायतों में बेहतर ढंग से कार्य संचालन के लिए समितियों का भी गठन नहीं किया गया है. झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 की धारा 71 में पंचायतों में ठीक ढंग से कार्य संचालन के लिए सात तरह की समितियों के गठन की बात कही गयी है. ये हैं : 1. सामान्य प्रशासन समिति,  2. विकास समिति,  3. महिला, शिशु एवं सामाजिक कल्याण समिति, 4. स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पर्यावरण समिति, 5. ग्राम रक्षा समिति, 6. सार्वजनिक संपदा समिति,  7. अधोसंरचना समिति. दूसरी ओर जिला परिषद के स्तर पर समितियों का गठन हुआ है. जिला परिषद व ग्राम पंचायत को कई अधिकार भी मिले हैं, पर पंचायत समितियों के अधिकार व कार्य अबतक सही ढंग से चि?ित नहीं किये जा सके हैं.
लोहरदगा जिला परिषद की अध्यक्ष जयवंती भगत स्वीकारती हैं कि अफसरशाही के कारण काम करने में दिक्कतें होती है. जयवंती देवी के अनुसार, बीआरजीएफ को छोड़ और किसी भी मद से कम करने का अधिकार अबतक नहीं मिला है और न ही अबतक प्रबंध पर्षद की बैठक ही हुई है. वे कहती हैं कि गजट के अनुसार, जिला परिषद के गठन के साथ ही जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) का उसमें विलय हो जाता है. पर, अबतक नियमावली नहीं बनाये जाने के कारण दिक्कतें हो रही हैं. नियामवली का किस्सा भी राज्य में बड़ा दिलचस्प है. पंचायत निकायों के गठन के बाद  डीआरडीए का जिला परिषद में विलय हो जाना  चाहिए व इसके अध्यक्ष का पद जिला परिषद अध्यक्ष को मिलना चाहिए. इस संबंध में राज्य सरकार ने 18 अक्तूबर 2011 को सभी उपायुक्तांे व डीडीसी को नियमावली व एमओयू में संशोधन करने का निर्देश दिया.  कहा गया कि नियमावली में संशोधन कर जिला परिषद अध्यक्ष को डीआरडीए का अध्यक्ष बनायें. पर, राज्य के जिलों में  नियमावली में संशोधन नहीं हो पाया है. इसके लिए नियमावली नहीं मिलने को कारण बताया जा रहा है. ऐसे में अब तक जिला परिषद अध्यक्षों को डीआरडीए का अध्यक्ष नहीं बनाया जा सका है. राज्य सरकार के ग्रामीण विकास विभाग की अ ोर से एक बार फिर 17 दिसंबर 2011 को उपायुक्तों को पत्र लिख कर जिला परिषद अध्यक्षों को डीआरडीए का पद देने को कहा गया, पर उस पर भी अमल नहीं हो सका.
पिछले दिनों मुख्यमंत्री को समस्याओं से अवगत कराने वाली जयवंती भगत कहती हैंे, जब वे अधिकारियों से नियमावली बनाने या उसमें संशोधन को कहती हैं, तो उनका जवाब होता है प्रक्रिया जारी है. हजारीबाग जिला परिषद के अध्यक्ष ब्रजकिशोर जायसवाल प्रशासन की मंशा पर संदेह व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जो स्थितियां हैं, उसमें डीआरडीए की जिम्मेवारी मिलना मुश्किल लग रहा है.